पीएम मोदी के विदेशी दौरों को लेकर हमेशा से टिप्पणी की जाती रही है लेकिन उनके परिणामों पर कम ही लोग गौर कर पाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ महीनों में यूरोप की तीन बार यात्रा कर चुके हैं। हालांकि पीएम मोदी के विदेशी दौरों को लेकर हमेशा से टिप्पणी की जाती रही है लेकिन उसके परिणामों पर कम ही लोग गौर कर पाते हैं। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में ये जरूरी हो गया है भारत यूरोपीय देशों, अमेरिका, रूस, अफ्रीकी देशों और आसियान देशों के साथ अपने व्यापारिक और सामरिक रिश्तों को और मजबूत करे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं। पीएम मोदी यूरोप के उन देशों से विशेष संपर्क बढ़ा रहे हैं जिन्हें भारत से मिले अरसा हो गया था। याद करिए स्पेन और पुर्तगाल की यात्रा। पीएम स्पेन जाने वाले पहले प्रधानमंत्री बने तो वहीं पुर्तगाल में तीन दशक बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुंचा। इसके अलावा भारत लगातार जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के संपर्क में है। ये तीनों देश यूरोप की अर्थ व्यवस्था की धुरी है। हाल ही में पीएम मोदी ने G-20 समिट में भाग लिया जहां उन्होंने दूसरी बार जर्मनी की यात्रा की और दोनों देशों के व्यापारिक और हितों को आर भी मजबूत किया। आपको बता दें कि जर्मनी भारत का एक प्रमुख आर्थिक सहयोगी है। G-20 समिट से छनकर कुछ बातें आई हैं जो इस बात का एहसास दिलाती हैं कि भारत ग्लोबल इकोनॉमी की धुरी बन चुका है और चीन इस मामले में भारत से लगतार पिछड़ता नजर आ रहा है।
भारत के प्रति यूरोपीय देशों का नजरिया बदला
साल 1998 में पोकरण में हुए परमाणु परीक्षण के बाद तमाम यूरोपीय देशों ने भारत से किनारा कर लिया था। कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध भी लगा दिया, पर अब वक्त बदल गया है। भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था की धुरी बन चुका है। ये बात दुनिया भी जानती है और यूरोप भी। इसीलिए अब यूरोप भारत में तमाम क्षेत्रों में निवेश के अवसर देख रहा है। चीन की मौजूदा हालत से यूरोपीय कंपनियां पीछे हट रही हैं और भारत को अपना नया ठिकाना बना रही हैं। यहां तक की चीन की अग्रणी मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनी श्याओमी ने भारत के आंध्रप्रदेश मे अपना डाटा सेंटर शुरु कर दिया है और वहीं मोबाइल उत्पादन भी शुरु कर दिया है। यूरोप के अलावा अमेरिका और अन्य देश भी भारत को निवेश और कारोबार के नजरिए से बेहतर मान रहे हैं। अब यहां हमें ये समझना होगा कि आखिर यूरोप और बाकी देशों में अचानक इतना बदलाव क्यों आ आ गया है।
जी-20 की अगुआई कर सकते हैं भारत और यूरोपीय यूनियन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूरोपीय देश स्पेन की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। स्पेन यूरोप के उन चुनिंदा देशों में है जिसने दशकों तक आतंकवाद का मजबूती से मुकाबला किया है। वहीं स्पेन की तकनीक भी बेहतरीन है। भारत में चल रही टैल्गो ट्रेन स्पेन की ही है। भारत को स्पेन से रेलवे, स्मार्ट सिटी और रीन्यूबल उर्जा के साथ-साथ सामरिक मदद भी मिल सकती है। इसके अलावा अन्य यूरोपीय देश खासकर कि जर्मनी ये मान रहें हैं कि अगर G-20 में अमेरिका अपनी भूमिका सही से नहीं निभाता है तो भारत और यूरोपीय यूनियन मिलकर G-20 की अगुवाई कर सकते हैं।
भारत-जर्मनी फ्री ट्रेड के पक्ष में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल दोनों ही फ्री ट्रेड के हिमायती हैं इसके अलावा भारत ने यूरोपीय यूनियन को लेकर जर्मनी के रुख का समर्थन भी किया है। भारत और जर्मनी एक बार फिर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर यूरोपीय यूनियन से बात-चीत शुरु कर सकता है।
यूरोपीय यूनियन की नजर भारत पर
अक्टूबर में नई दिल्ली में भारत यूरोपीय यूनियन की समिट है। इस समिट से भारत और यूरोप के बीच व्यापार और निवेश संबंध और भी मजबूत होंगे। वहीं भारत यूरोप से तकनीक, युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और निवेश लाने के लिए हर तरह का उपाय करेगा। स्किल्ड वर्कर्स और निवेश से भारत की ग्रोथ रेट में तेजी से उछाल आएगा साथ ही देश में रोजगार के नए उपक्रम शुरु होंगे। वहीं यूरोप भी ऐसे ही एक बाजार की तलाश में है जहां तरक्की की संभावना ज्यादा हो।
चीन नहीं भारत है भरोसेमंद साथी
वहीं चीन के रुख से तमाम यूरोपीय देश बड़े ही असमंजस में है। जाहिर सी बात है चीन को जहां भी जरा सी जगह मिलती है वहां अपना कब्जा कर लेता है, चाहे वह जमीन हो या फिर आर्थिक क्षेत्र। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पाकिस्तान है जहां चीन ने निवेश के नाम पर बलूचिस्तान से लेकर पीओके तक कब्जा कर लिया है। वहीं अब पाकिस्तान ने चीनी नागरिकों को रियल स्टेट सेक्टर में निवेश और घर खरीदने की इजाजत दे दी है। चीन की यही नीति यूरोप को डराती है जबकि भारत के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। भारत के अलावा यूरोप के तमाम देश चीन के वन-बेल्ट-वन रोड का बहिष्कार कर चुके हैं, इसीलिए यूरोप को भारत में एक भरोसेमंद सहयोगी नजर आ रहा है।
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