भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करते हुए इसे 6.50 पर पहुंचा दिया। रेपो रेट वह इंट्रेस्ट रेट है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक आरबीआई कमर्शल
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करते हुए इसे 6.50 पर पहुंचा दिया। रेपो रेट वह इंट्रेस्ट रेट है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक आरबीआई कमर्शल बैंकों को पैसे उधार देता है। जून में अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान सेंट्रल बैंक ने बढ़ती महंगाई के दबाव का हवाला देते हुए रेपो रेट या शॉर्ट-टर्म लेंडिंग रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करते हुए 6.25 प्रतिशत कर दिया था।

वहीं महंगाई पिछले आठ महीने से आरबीआई की ओर से तय 4 प्रतिशत के टारगेट से ऊपर रही है। इसलिए एक बार फिर से रेट में बढ़ोतरी होने की बात पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं थी। वैसे भी कई विश्लेषकों ने इस साल नीतिगत ब्याज दरों में 50 बीपीएस की वृद्धि का अनुमान जताया है। बढ़ती महंगाई, रुपये के घटते मूल्य, कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और पूरे विश्व में व्यापार संबंधी तनाव के कारण आपके पोर्टफोलियों में भी अस्थिरता का दिखाई देना एक आम बात है, लेकिन उन इंवेस्टरों के लिए इसका क्या मतलब है जिन्होंने डेट म्यूच्युअल फंड्स में इंवेस्ट किया था।
इंट्रेस्ट रेट की अस्थिरता
डेट म्यूच्युअल फंड को कभी-कभी फिक्स्ड डिपॉजिट के एक विकल्प के रुप में देखा जाता है। लेकिन इसमें इसमें इंट्रेस्ट रेट से जुड़े रिस्क होते हैं जो उन्हें अस्थिर बना सकते हैं। लांग टर्म डेट म्यूच्यूअल फंड्स के बुनियादी ऐसेट्स, बॉन्ड्स हैं। इंट्रेस्ट रेट्स के साथ बॉन्ड्स का उल्टा रिश्ता है। हाल के वर्षों में जब इंट्रेस्ट रेट्स गिर रहे थे, तब बॉन्ड फंड्स ने ज्यादा रिर्टन दिया था। जिनमें से कुछ बॉन्ड फंड्स ने कुछ सालों में कभी-कभी बहुत ज्यादा रिर्टन दिया था। लेकिन वहीं अब लगातार दो मॉनिटरी पॉलिसी रिव्यू में इंट्रेस्ट रेट में बढ़ोतरी होने के कारण बान्ड्स की कीमतें गिर जाएंगी। इसलिए, बॉन्ड फंड के एनएवी में भी भारी गिरावट आएगी। जो इन्वेस्टर्स तीन साल या उससे ज्यादा समय के लिए इन्वेस्ट करना चाहते हैं उनके लिए लॉन्ग-टर्म डेट फंड्स सही हैं क्योंकि लम्बे समय में उन्हें इंट्रेस्ट रेट से संबंधित अस्थिरता के असर को बेअसर करने का मौका मिलेगा।
अभी क्या करना चाहिए?
इंट्रेस्ट रेट से जुड़ी अस्थिरता से बचने के लिए और उसके समान रिटर्न कमाने के लिए या फिक्स्ड डिपॉजिट से थोड़ा ज्यादा रिटर्न कमाने के लिए आप कम मच्योरिटी पीरियड वाले सिक्यॉरिटी फंड में इन्वेस्ट करने पर विचार कर सकते हैं। शॉर्ट-टर्म डेब्ट फंड्स या लिक्विड फंड्स आपके पोर्टफोलियो से जुड़ी जरूरतों को स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।
आरबीआई की महंगाई को काबू में लाने की चाहत को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य में इस रेट में फिर से बढ़ोतरी हो सकती है। लॉन्ग-टर्म डेब्ट फंड्स पर इसका नेगेटिव असर पड़ेगा। इसलिए, आप या तो इस तरह के इन्वेस्टमेंट से बाहर निकल सकते हैं। लेकिन,आप इसमें लंबे समय के लिए इन्वेस्ट करना चाहते हैं और रिस्क उठाना चाहते हैं तो इसमें निवेश बनाए रख सकते हैं और अपनी लागत को औसत में आने दे सकते हैं।
More From GoodReturns

RBI पॉलिसी के बाद निवेश: FD या SIP, कहां मिलेगा ज्यादा मुनाफा?

RBI रेपो रेट का फैसला: क्या आपकी EMI बढ़ेगी?

RBI पॉलिसी मीटिंग: क्या आपकी EMI और FD पर पड़ेगा असर?

आज का Financial Raashifal: 31 मार्च, 2026 - स्मार्ट जोखिम प्रबंधन से समय पर अवसरों का लाभ उठाएं

आज का Financial Raashifal: 02 अप्रैल, 2026 - सूक्ष्म बाज़ार संकेतों से व्यावहारिक अवसर खोजें।

Bank Account बदलना है? RBI ले आया बड़ा Rule, ग्राहकों को राहत, Bank रोएंगे?

आज का Financial Raashifal: 03 अप्रैल, 2026 - आज के छिपे अवसरों और जोखिम संकेतों का पता लगाएं

आज का Financial Raashifal: 04 अप्रैल, 2026 - अस्थिर बाजारों में छिपे अवसरों का पता लगाएं

आज का Financial Raashifal: 06 अप्रैल, 2026 - अनुशासित रणनीति से अल्पकालिक लाभ उठाएं

आज का Financial Raashifal: 05 अप्रैल, 2026 - अस्थिरता का लाभ उठाएं और अपने नकद को सुरक्षित रखें

Gold Price: Gold से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव, निवेशकों के लिए बड़ा झटका अब देना होगा टैक्स!



Click it and Unblock the Notifications