India GDP Growth; IMF Rating 'C' Grade: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में टैक्स रिफॉर्म समेत कई तरह के कदम उठाए जाने के बीच चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर तिमाही) में भारत का ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत से अधिक रहा। पिछले हफ्ते जारी आंकड़ों के अनुसार, इंडिया का जीडीपी ग्रोथ अप्रैल-जून तिमाही में दर्ज 7.8% के मुकाबले FY26 Q2 में 8.2 प्रतिशत रहा। यह पिछले छह तिमाहियों में सबसे अधिक है।
हालांकि, इस तेज विकास दर के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की 2025 की वार्षिक स्टाफ रिपोर्ट ने एक बार फिर से देश के नैशनल अकाउंट जिसमें जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) डेटा भी शामिल है, को 'सी' ग्रेड दिया है। ऐसे में इसको लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। तो आइए समझने की कोशिश करते हैं कि इस रेटिंग का क्या मतलब है और आगे भारत को क्या करना चाहिए?
भारत के आर्थिक आंकड़ों का मूल्यांकन क्यों करता है IMF?
IMF द्वारा सांख्यिकीय गुणवत्ता पर चिंताएं उजागर करने और अर्थशास्त्रियों द्वारा इस तेज वृद्धि पर आश्चर्य व्यक्त किए जाने के बाद, भारत के जीडीपी आंकड़ों की प्रामाणिकता और उनके निहितार्थों पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

IMF हर साल अपनी 'अनुच्छेद IV' (Article IV) परामर्श प्रक्रिया के तहत भारत के आर्थिक आंकड़ों का मूल्यांकन करता है। इस प्रक्रिया के दौरान, IMF की एक टीम देश का दौरा करती है, आर्थिक विकास की समीक्षा करती है और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है।
इस प्रक्रिया में 'डेटा पर्याप्तता मूल्यांकन' (Data Adequacy Assessment) भी शामिल होता है, जिसके तहत यह जांचा जाता है कि भारत के आंकड़े प्रभावी आर्थिक निगरानी के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
IMF ने 2025 के अपने मूल्यांकन में क्या कहा?
IMF ने कहा कि नीति निर्माण में सहायता करने के लिए भारत को व्यापक आर्थिक और वित्तीय आंकड़ों की बेहतर गुणवत्ता, उपलब्धता और समयबद्धता से काफी लाभ होगा।
भारत द्वारा जीडीपी और सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) श्रृंखलाओं को अपडेट करने के प्रयासों को स्वीकार करते हुए भी, IMF ने कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की सिफारिश की है। इनमें नैशनल अकाउंट और मूल्य सूचकांकों में नियमित संशोधन, लंबित जनसंख्या जनगणना का प्राथमिकता के आधार पर संचालन, केंद्र-राज्य के संयुक्त राजकोषीय डेटा का समय पर प्रकाशन और प्रमुख आंकड़ों के कवरेज व संगति में सुधार शामिल हैं।
IMF ने अपनी रिपोर्ट में कंसोलिडेटेड डेटा का न होना भी एक बड़ा फैक्टर बताया है। IMF ने कहा कि सबसे बड़ी कमी यह है कि 2019 से (2015-16 फिस्कल ईयर के लिए) आम सरकार (केंद्र + राज्य + स्थानीय सरकारें) के लिए कोई ऑफिशियल, समय पर कंसोलिडेटेड डेटा पब्लिश नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि भारत के असली फिस्कल डेफिसिट और पब्लिक डेब्ट का सही अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है, क्योंकि राज्य लेवल पर उधार लेना एक अहम हिस्सा है।
हालांकि, भारत ने जवाब में बताया कि सुधार चल रहे हैं और नई जीडीपी व सीपीआई श्रृंखलाएं फरवरी 2026 तक आने की उम्मीद है। भारत ने तर्क दिया कि इन प्रयासों के कारण उसे उच्च रेटिंग मिलनी चाहिए।
IMF ने भारत को दी 'C' ग्रेड की रेटिंग
भारत की दलीलों के बावजूद IMF ने 2024 वाली ही रेटिंग बरकरार रखी। नैशनल अकाउंट्स के लिए IMF ने भारत को 'C' ग्रेड दिया है, जबकि अन्य सभी श्रेणियों के लिए 'बी' ग्रेड और ओवरऑल रेटिंग 'B' दिया है। IMF ने कई कमजोरियों की ओर इशारा किया है जिनमें से एक प्रमुख मुद्दा जीडीपी की गणना के लिए भारत का 2011-12 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग करना है।
आईएमएफ का तर्क है कि भारत जैसी गतिशील अर्थव्यवस्था एक दशक में महत्वपूर्ण रूप से बदल जाती है। कीमतों और आर्थिक भार की ऐसी पुरानी संरचना का उपयोग करने से जीडीपी वृद्धि गलत बताई जा सकती है, क्योंकि यह डिजिटल सेवाओं जैसे नए उभरते क्षेत्रों को पूरी तरह से नहीं दर्शाती है।
IMF की रेटिंग्स का क्या मतलब है?
IMF की रेटिंग 'A' से 'D' तक होती हैं, जहा 'A' का अर्थ है डेटा निगरानी के लिए पूरी तरह पर्याप्त है। 'B' का मतलब है कि डेटा मोटे तौर पर पर्याप्त है, लेकिन इसमें कुछ कमियां हैं। 'C' ग्रेड का मतलब है कि डेटा में ऐसी कमियां हैं जो निगरानी में कुछ बाधा डालती हैं, जबकि 'D' का अर्थ गंभीर कमियों से है जो निगरानी को महत्वपूर्ण रूप से बाधित करती हैं।
भारत को नैशनल अकाउंट के लिए मिला 'सी' ग्रेड दिया गया है। IMF का मानना है कि जीडीपी डेटा के कवरेज, डेटा की सूक्ष्मता या कार्यप्रणाली में दोष है, जो ठोस विश्लेषण को सीमित करता है, भले ही अन्य डेटासेट मोटे तौर पर स्वीकार्य हों।
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