होम इंश्योरेंस पॉलिसी लेते समय कुछ जरुरी बातें ध्यान रखने की आवश्यकता होती है, जो आपको यहां पर हम बताएंगे।
अधिकतर भारतीयों के लिए, घर एक बड़ी संपत्ति है। यही जगह है जहां हमें सुकून, आराम और सुरक्षा मिलती है। हर कोई अपने घर से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह आपकी मेहनत की कमाई से बनता है। लेकिन क्या आपने इसका इंश्योरेंस करवाया है?
देश के कई हिस्सों में बाढ़ जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं के बाद, अब आपको अपने घर का बीमा करवाने के बारे में सोचना होगा। ऐसी प्राकृतिक विनाशकारी घटना से कई लोगों का घर छिन जाता है और पैसे का एक बड़ा नुकसान होता है। पहले ही थोड़ी प्लानिंग करके, इससे बचा जा सकता है। इन आपदाओं से घर की सुरक्षा के लिए, घर का इंश्योरेंस करवाना जरूरी है। हम आपको 6 जरूरी चीजें बता रहे हैं जो आपको घर का इंश्योरेंस करवाने के लिए सही पॉलिसी चुनने में आपकी मदद करेंगी।
1.बिल्डिंग और कंटेन्ट
दो तरह की इंश्योरेंस पॉलिसी हैं। एक है बेसिक फायर इंश्योरेंस पॉलिसी और दूसरी हाउस होल्डर पैकेज पॉलिसी। बेसिक फायर इंश्योरेंस पॉलिसी आपके घर को आग, बिजली गिरना, तूफान, बाढ़ और दंगे आदि से सुरक्षित करती है। कुछ पॉलिसीज में भूकंप और लैंडस्लाइड भी शामिल होते हैं, यदि नहीं तो आप एड-ऑन इन्हें शामिल करा सकते हैं। हाउस होल्डर पैकेज पॉलिसी यानि एचपीपी में इन सब आपदाओं में आपके सामान की सुरक्षा मिलती है। इसमें चोरी, नुकसान होना, मैकेनिकल या इलेक्ट्रिकल रूप से चीज का खराब हो जाना शामिल है। इसमें आतंकवादी गतिविधियों पर भी कवर मिलता है। इसमें केवल सामान पर भी इंश्योरेंस मिलता है। लैपटॉप, कैमरा, ज्वेलरी आदि समान इसमें कवर होता है। घर के बाहर भी सुरक्षा के लिए अवे-फ्रम-होम कवर भी मिलता है।
2. मार्केट वेल्यू और पुनर्स्थापन
इसमें बीमित राशि का निर्धारण दो तरह से किया जाता है। बीमित आइटम की लागत और रिइनस्टेमेंट (पुनर्स्थापन) की लागत। जब बीमित राशि को आइटम की लागत के आधार पर निर्धारित किया जाता है तो चीजें जब खराब हो रही हैं उसके अनुसार वेल्यू घटा दी जाती है। खास तौर पर, 50 सालों के लिए चीजें 2% की वार्षिक दर से खराब होती या घिसती हैं, यदि आपका कवर सस्ता है, तो बीमित आइटम का पर्याप्त रिपलेसमेंट नहीं होता है। इससे अच्छा विकल्प है रिइनस्टेमेंट लागत का बीमा - यह वो लागत है जो उस आइटम को उसी क्वालिटी की चीज से रिपलेस करने में लगेगी। यह ध्यान रहे कि इसमें रिपलेसमेंट राशि आइटम का रिपलेस करने या बदलने पर ही मिलती है। विराट कोहली ने मुंबई लक्जरी अपार्टमेंट के लिए 34 करोड़ की डील की है, जो कि पश्चिमी उपनगर में नया पेंटहाउस तलाश रहे हैं।
3. कटौती
ज़्यादा कटौती को स्वीकार कर आप प्रीमियम कम कर सकते हैं। ध्यान रखें कि कटौती जितनी ज़्यादा होगी, आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भी ज़्यादा होगा। यदि कोई व्यक्ति कुछ चीजों की कटौती करता है तो उसे ध्यान रखना चाहिए उनकी कीमत इतनी कम हो, कि क्लेम के समय आसानी से भुगतान किया जा सके।
4. छूट के लिए पूछें
कुछ बीमाकर्ता एक पॉलिसी के साथ एक और पॉलिसी लेने पर अतिरिक्त छूट भी देते हैं। उदाहरण के तौर पर, घर के साथ वाहन का बीमा करवाने पर प्रीमियम कम देना पड़ता है। एंटी-थेफ्ट सिस्टम लगाना, डेडबोल्ट लोक लगाना, इंपेक्ट-रिसिस्टेंट रूफ आदि से आपका प्रीमियम कम हो सकता है।
5. वैकल्पिक आवास और लीगल कवर
अधिकतर लोग इस पर ध्यान नहीं देते हैं, जबकि वैकल्पिक आवास का कवर ज़रूरी है। खास तौर पर रिइनस्टेटमेंट पॉलिसी में जहां नया ढांचा बनने के बाद ही आपको पुराने का कवर मिलता है। इसके साथ ही किसी अप्रत्याशित बात के लिए लीगल कवर भी ज़रूरी है, जैसे इलेक्ट्रिक उपकरण से इलेक्ट्रिक शॉक लग जाये या किसी की कार से टाइल्स को नुकसान हो जाए।
6. बीमित राशि का पुनः मूल्यांकन
घर पूरा कवर है या नहीं इसके लिए हर 5 सालों में अपने बीमा का पुनः मूल्यांकन ज़रूर करें। क्यों कि बिल्डिंग की लागत और सामान की कीमत आर्थिक चक्र और मुद्रास्फीति के कारण बढ़ती है। क्लेम के समय, यदि घर पूरा कवर नहीं होगा तो जो चीजें क्लेम में नहीं आ रही हैं उनका कवर नहीं मिलेगा। इसी तरह यदि ओवर-इंश्योरेंस यानि ज़रूरत से ज़्यादा का बीमा करवा रखा है तो हर साल ज़्यादा प्रीमियम देना पड़ता है जब कि उसकी ज़रूरत ही नहीं है। भारत में आज एक घर बनाने में लाखों, करोड़ों रुपए लगते हैं, यह निर्भर करता है कि आप घर कहाँ बना रहे हैं। इस इतनी बड़ी राशि की सुरक्षा के लिए साल के कुछ हज़ार रुपए खर्च करना एक अच्छा निर्णय है।
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