नई दिल्ली, मार्च 27। आप एनएच-28 के माध्यम से कई कस्बों और गांवों में पहुंच सकते हैं। इन्हीं में से एक है उत्तर प्रदेश का माचा नाम का एक छोटा सा गांव। इस गांव को यहां के कई निवासियों ने बेहतर अवसरों की तलाश में छोड़ दिया है। छोड़ने वालों में से कुछ को कामयाबी मिली है और कुछ को नहीं। गाजीपुर जिले में स्थित इस गांव के निवासियों में सभापति शुक्ल भी हैं, जो अब 69 साल के हो गए हैं। उन्होंने यहीं रहने का फैसला किया। आज उनका यह फैसला न सिर्फ उनके लिए बल्कि बाकी माचा के लिए भी फायदेमंद साबित हुआ है। उन्होंने यहीं रह कर करोड़ों रु का बिजनेस खड़ा कर लिया है। आइए जानते हैं कैसे।
अचानक मिली कामयाबी
सभापति के अनुसार यह सफलता अचानक मिली। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार वे इससे पहले एक गन्ना किसान थे। उन्होंने इस काम में बहुत बड़ा नुकसान उठाया। एक बार वे पूरी फसल को नष्ट करना चाहते थे, पर उनकी पत्नी ने सुझाव दिया कि इस गन्ने का उपयोग सिरका बनाने के लिए करें। यह सिर्फ एक प्रयोग था। मगर इसी प्रयोग ने उन्हें करोड़पति बना दिया।
बैंक से लिया लोन
गन्ने की खेती के तीन साल बाद, सभापति को लगा कि इससे कुछ नहीं हो रहा। उनका नुकसान बढ़ रहा था और परिवार के लिए खर्च भी। उनके परिवार के सदस्यों ने कस्बे में नौकरी करने का दबाव डाला। उनका परिवार चाहता था कि वे गाँव से दूर चले जाएं। पर सभापति ऐसा नहीं चाहते थे। आखिरकार 2001 में सभापति परिवार से अलग हो गए। उनके पास उस समय पास खुद के 10 रुपये भी नहीं थे। एक स्थानीय बैंक में बैंक प्रबंधक था जिसने उन्हें 50,000 रुपये का लोन दिया। उस पैसे से सभापति ने गन्ने का खेत स्थापित किया।
पत्नी ने दिया आइडिया
सभापति ने अपनी पत्नी से गन्ने के बागान में आग लगाने के लिए कहा था। उनके अनुसार यह केवल उनके लिए दुर्भाग्य ला रहा था और वे इसे जारी नहीं रखना चाहते थे। पर उनकी पत्नी इस हक में नहीं थी। उनकी पत्नी शकुंतला ने सभापति से आग्रह किया कि वे पूरी उपज को नष्ट करने के बजाय गन्ने से सिरका बनाने पर विचार करें।
1.50 करोड़ रु का टर्नओवर
शुरुआत में पुरानी तकनीक से सिरका बनाने के बाद सभापति ने कुछ बदलाव किए। पहले बैच की बिक्री से 16,000 रुपये की कमाई से लेकर 1.50 करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक कारोबार करने तक, सभापति कहते हैं कि उन्होंने जो भी सफलता हासिल की है, उसके लिए वह बहुत आभारी हैं।
कई लोग करते हैं काम
आज सभापति का बिजनेस छह पुरुषों और 10 महिलाओं को स्थायी आधार पर रोजगार देता है और 50 अन्य लोगों को सीजन के समय में काम पर रखा जाता है। औसतन इस व्यवसाय से जुड़ा एक कामगार प्रति माह 8,000 रुपये से 10,000 रुपये के बीच घर ले जाता है। सभापति का कहना है कि वे अब तरह-तरह के अचार और गुड़ भी बनाते और बेचते हैं। एक लीटर सिरके की कीमत 50 रुपये है और इसे स्पीड पोस्ट के जरिए भारत के किसी भी हिस्से में पहुंचाया जा सकता है।
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