
Budget 2023 : बैंकिंग सेक्टर (Banking Sector) का बुरा वक्त अब खत्म होता दिख रहा है। सरकारी बैंको का एनपीए बहुत बढ़ गया था। वर्तमान में कई बड़े राइट-ऑफ के बाद सरकारी बैंकों की खाता बुक्स साथ-सुथरी दिख रही हैं। पिछले कुछ सालों में निवेशकों ने बैंको में खूब पुंजी डाली है। इस समय अवधि में नई पूंजी मिलने से बैंकों के कैपिटल एडेक्वेसी रेशियो (CAR) में सुधार हुआ है। बैंकिंग सेक्टर के स्टॉक पिछले कुछ महीनों से बहुत तेजी दिखा रहे हैं। अब बैंकिंग सेक्टर को ग्रोथ के रेट को किसी नए पॉजिटिव संकेतों का इंतजार है। हालांकि, बैंकिंग सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद ग्लोबल और डोमेस्टिक इकोनॉमी के लिए अब भी कई चुनौतियां सामने हैं। केंद्रिय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी कर रहे हैं। महंगाई और सप्लाई चेन में हो रही दिक्कतों के कारण ग्लोबल इकोनॉमी पर मंदी का खतरा दिख रहा है।
बेरोजगारी है समस्या
जानकारों को कहना है कि बढ़ती बेरोजगारी का असर बैंकों की एसेट क्वालिटी पर पड़ सकता है। मंदी के आसंका के बीच दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने बैंकों को दिए जाने वाले राहत पैकेज वापस लेने का निर्णय लिया है। बैंकों के इस कदम से लिक्विडिटी में काफी कमी आई है। जानकारों के मुताबिक अगर इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ उम्मीद के मुताबिक नहीं होती है, तो क्वालिटी एसेट पर फिर से दबाव बन जाएगा। अगर ऐसा होता है तो छोटे ग्राहकों और कंपनियों को दिए गए लोन के रिपेमेंट में दिक्कत आ सकती है।
इन दो बातों पर ध्यान देना है जरुरी
मौजुदा हालात को देखते हुए उम्मीद है कि आगामी बजट में फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण बैंकिंग सेक्टर की ग्रोथ का रोडमैप पेश कर सकती हैं। जानकारों का कहना है कि दो मुख्य क्षेत्र हैं, जिनपर बैंकिंक सेक्टर ने उम्मीद लगाई है। बैंको को उम्मीद है कि बजट में सरकारी बैंकों को नई पूंजी का आवंटन हो सकता है। दूसरा है कि सरकार सरकारी बैंकों के निजीकरण का उपाय पर कुछ कदम उठाएगी। कुछ जानकारों का कहना है कि वित्त मंत्री अगले बजट में इन दोनों मामलों को छूने से बच सकती हैं। सरकार बैंकों की बेहतर वित्तीय कंडिशन को देखते हुए नई पूंजी देने का ऐलान नहीं करेंगी। सरकार ने पिछली कुछ बजट में सरकारी बैंको को फंड मुहैया कराया था।

बेहतर हो रहे हैं हालात
सरकारी डाटा के मुताबिक बैंकों का नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPAs) में गिरावट हुई है। यह 31 मार्च, 2022 को घटकर 7.6 प्रतिशत था। एनपीए का यह डाटा पिछले 6 साल में सबसे कम है। यही नहीं बैंकों के कैपिटल-टू-रिस्क वेटेड एसेट रेशियो (CRAR) में भी सुधार देखने को मिला है। यही कारण है कि सरकार बैंकों को नई पूंजी देने में का निर्णय नहीं ले सकती है। सरकारी बैंकों के निजीकरण करने के लिए भी सरकार बड़ा कदम नहीं उठाएगी। बैंको के प्राइवेटाइजेशन पर विपक्ष मुखर है, यही कारण है कि सरकार इसपर फैसला नहीं कर सकती है।
कुछ बड़े कदम की जरूरत
सरकारी बैंकों में एंप्लॉयीज ट्रेड यूनियंस काफी हद तक मजबूत हैं। इसीलिए सरकार को बड़े कदम उठाने से पहले काफी सोच विचार करना पड़ता है। अच्छे प्रदर्शन के बाद अब भी बैंकों के बुक्स में काफी खराब एसेट्स शामिल हैं। यहीं कारण हैं कि इन बैंकों में पैसे लगाने से पहले निवेश संकोच करते हैं। सरकार ने पिछले कुछ सालो में बैंकों के निजीकरण का बेहतर कदम उठाया है। सरकार ने 2020 में 10 सरकारी बैंकों का विलय 4 बैंकों में किया था। इस कदम के अलावा 2019 में LIC ने IDBI Bank खरीदा था। सरकार का लक्ष्य है कि कुछ बड़े सरकारी बैंकों का विलय कर एक बड़ा बैंक बनाया जाए। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से बैंक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े बैंकों का मुकाबला करने में सक्षम हो सकेंगे। अन्य देशों जैसे की चीन और जापान के बड़े बैंकों की तुलना में इंडियन बैंकों का साइज छोटा है।
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